Thursday, April 30, 2020

वो मस्तमौला अंदाज और मासूम चेहरा........ आप हमेशा दिलों में रहेंगे चिंटू सर


ऋषि कपूर अब हमारे बीच नहीं है, यह यकीन करना बेहद मुश्किल हो रहा है। बचपन में उन्हें टीवी पर उनके निभाये किरदारों के माध्यम से जाना और इनके जरिये उन्होंने जो छाप मेरे बालसुलभ मन पर छोड़ी वह अमिट हो गई। यही वजह है कि कई मामलों में मैने उनकी नकल की। इनमें से ही एक है स्वेटर को लेकर उनका प्यार। अपनी फिल्मों में जितने तरह के स्वेटर और मफलर में ऋषि साहब नजर आए शायद ही कोई और अभिनेता दिखा हो। हमने भी उनकी तरह खूब स्वेटर पहने और जोड़े।    
हमारा बचपन आज के बच्चों जैसा तकनीक सुलभ नहीं था। न तो डीटूएच था और न ही इंटरनेट। तो फिर यूट्यूब, नेटफिलक्स और 24 घंटे फिल्म और फिल्मी गानों का सवाल ही नहीं। ले-देकर एक दूरदर्शन था जो रविवार को एक फिल्म और बुधवार और शुक्रवार को फिल्मी गाने दिखाता था। हां रविवार सुबह भी रंगोली में गाने आते थे। यानी फिल्मों और उनकी दुनिया से जुड़ाव का यही एक साधन था। ऐसे में जब मैने पहली बार टीवी पर प्रसारित हो रही फिल्म बॉबी देखी तो उसमें ऋषि कपूर के एक किशोर तौर पर निभाए किरदार ने जैसे बालसुलभ मन पर कब्जा कर लिया। यह ऋषिकपूर की पहली फिल्म थी जो मेरी भी संजीदगी के साथ देखी गई पहली  फिल्म थी। आठ-नौ बरस के बालक को इसने दीवाना बना लिया। इसके बाद एक और फिल्म अब तक कई बार देख चुका हूं और जिसके गाने तो आज भी सुनता हूं वह है..प्रेमरोग।
ऋषि कपूर साहब मेरे पसंदीदा उन कुछ अभिनेताओं में शामिल रहे जिनकी फिल्में देखकर मैं बड़ा हुआ, लेकिन उनके अभिनय को नहीं भूला। बचपन में उन फिल्मों को देखने का जो नजरिया था उम्र के  साथ वह भी बदला और इसी के साथ फिल्म को फिर से देखा। यह कपूर साहब का ही जादू है कि अब भी कर्ज,  नागिन, चांदनी, लम्हे, दीवाना फिल्म अगर टीवी पर आ रही है तो उन्हें नजरअंदाज नहीं कर पाता हूं।  
उम्र के दूसरे पड़ाव पर भी ऋषि कपूर और मंजे हुए अभिनेता के तौर पर सामने आए। इनमें अग्निपथ में निभाये उनके किरदार ने तो ऐसा असर डाला कि यकीन करना मुश्किल हुआ। जिस अभिनेता को बचपन से बुराई के खिलाफ लड़ते देखा उसका नकारात्मक रूप मन ने स्वीकार नहीं किया। आखिरी फिल्म जो मैने उनकी देखी वो थी मुल्क जिसमें एक मुसलमान के किरदार में उन्होंने बेहतरीन छाप छोड़ी।
एक अभिनेता के साथ-साथ एक शख्स के तौर पर कपूर साहब की जिंदादिली भी मन को छू लेने वाली थी। अपनी बात को सख्ती से कहना और खरी-खरी कहना यह बाद के उनके जीवन का एक हिस्सा बन गया था। शायद इसी सख्ती के कारण जब तब उनकी परिजनों के साथ अनबन की खबरें भी आईं। टिवटर पर तो वह खूब सक्रिय थे और जब तब अपनी बात को लेकर अड़ जाते थे। ट्रोल किए जाने पर भी किसी की परवाह किए बिना उन्हें खूब जवाब देते थे।    
ऋषि कपूर साहब की आज सुबह जब निधन की खबर आई तो एक बारी सन्न रह गया। सहसा यकीन नहीं हुआ। इरफान खान के बाद एक और दिग्गज का यूं चले जाना बुरी तरह झकझोर गया है। लॉकडाउन के इस समय में जब सब घरों में कैद हैं और अंजाने कोरोना वायरस से सहमे हुए हैं, ये झटका हिला देने वाला है। ऋषि कपूर का जाना एक अभिनेता का जाना नहीं  है, यह किसी अपने अजीज का जाना है। उस अजीज का जिसने उस वक्त आपको अभिनय से हंसाया-रुलाया-सिखाया जब आप अपने जीवन की सीढ़िया चढ़ रहे थे, एक व्यक्ति के तौर पर मुकम्मल हो रहे थे। अलविदा चिंटू सर, अब आप पहले की तरह हमसे रुबरु नहीं होंगे, लेकिन आपका काम, आपका अभिनय न केवल हमे बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित करता रहेगा।  ...

आप हमेशा हमारे दिलों में रहेंगे।

Tuesday, April 21, 2020

देश की कोरोना वायरस से जंगः घर में लॉकडाउन का एक माह पूरा

कोरोना वायरस के बढ़ रहे प्रकोप और सावधानियों को लेकर सरकार द्वारा की जा रही अपीलों के बीच एक माह पहले (21 मार्च 2020)  लगभग इसी वक्त ( रात 10.30 बजे)  जब अपने गृहनगर खेकड़ा पहुंचा था, तो यह कहीं तक भी अंदेशा नहीं था, कि लॉकडाउन में यहीं फंस जाऊंगा।  हर बार की तरह इस बार भी यही सोचकर आया था कि तीन दिन की छुट्टियां बिताकर वापस दिल्ली पहुंच जाऊंगा और फिर रोज की तरह दफ्तर और बाकी काम। दिल्ली से चलने से पहले मन में एक अंदेशा था, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 22 मार्च  रविवार को एक दिन के जनता कर्फ्यू के ऐलान को लेकर जन्मा था, लग रहा था जैसे लंबी लड़ाई की शुरुआत होने वाली है। इस अंदेशे की वजह थी इस दिन मेट्रो, रेल समेत सार्वजनिक सेवाओं का बंद होना। मन में एक खौफ पल रहा था कि आने वाले दिन कठिनाई भरे होने वाले हैं। 
दरअसल, कोरोना के खिलाफ जंग की शरुआत करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा था कि देशवासी 22 मार्च को रात नौ बजे तक जनता कर्फ्यू का पालन करे। इसे उन्होंने जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता का कर्फ्यू का नाम दिया था। उन्होंने शाम पांच बजे लोगों से कोरोना योद्धाओं के उत्साहवर्धन के लिए ताली, थाली बजाने की अपील भी की थी।
22 मार्च को जनता कर्फ्यू का पालन किया और घर से नहीं निकला, 23 तारीख भी बीती पर ये क्या 24 को प्रधानमंत्री के राष्ट्र के नाम संबोधन ने जैसे मन में पनप रही आशंका को सही साबित कर दिया। रात बारह बजे से 21  दिन के लॉकडाउन का ऐलान हो गया। यानि 25 मार्च से अगले  21 दिन तक जो जहां है, वहीं रहे।
प्रधानमंत्री केे राष्ट्र के नाम संबोधन तो कई हुए,लेकिन बेहद कठोर निर्णय वाला यह दूसरा माना जा सकता है। इससे पहला था नोटबंदी का। यह भी गजब इत्तफाक है कि जहां नोटबंदी के दिन भी अपनी दफ्तर से छुट्टी थी, वहीं लॉकडाउन का ऐलान भी हमने साप्ताहिक अवकाश होने के चलते घर पर ही बैठकर सुना।
देश अगले 21 दिनों के लिए लॉकडाउन हो  चुका था और हम इसी चुनौतियों को लेकर चिंताओं में घिर चुके थे। इन्हीं में सबसे पहली थी, काम कैसेे होगा। हालांकि दफ्तर इस चुनौती को पहले ही भांप चुका था और होली 10 मार्च के बाद से इसकी तैयारियां होने लगी थी, सभी  लोगों ने घर  से काम करने की तैयारियां करने को लेकर अपने-अपने लैपटॉप, डेस्कटॉप को  अपडेट कराना शुरू कर लिया था। संपादक जी ने सभी को इसके  लिए प्रेरित किया और लगभग हर साथी आपात स्थिति में घर से काम करने को लेकर अपनी तैयारी पूरी कर चुका  था। सब मोर्चे पर आ डटे और उनके साथ हम भी। 25 मार्च से विधिवत तौर पर घर से काम करना शुरू किया जो आज तक अनवरत जारी है.......



Sunday, August 6, 2017

फिल्मसमीक्षा- हिंदी मीडियमः बच्चों का एडमिशन बच्चों का खेल नहीं


फिल्म हिंदी मीडियम कहानी है ऐसे मां-बाप(राज बत्रा और मीता) की जो अपनी इकलौती बेटी को राजधानी  के टॉप स्कूल में दाखिला दिलाने के लिए हर जतन करते हैं।  पहले अमीरी के दम पर दाखिले की जुगत लगाते हैं जैसे पुश्तैनी घर छोड़कर महंगी कालोनी को आशियाना बनाते हैं। कंसलटेंट की मदद से खुद को अभिभावक के इंटरव्यू के लिए तैयार करते हैं। डोनेशन और सिफारिश का सहारा लेते हैं। इसमें असफल रहने के बाद एक दलाल की मदद से गरीब बनकर आरटीई कोटे के तहत सीट पाने में जुट जाते हैं। इस दौरान एक और गरीब की मदद से अंततः नामी स्कूल की सीट पाने में सफल हो जाते हैं। दाखिले की दौड़ में लगाई जाने वाली ये तिकड़में ही फिल्म में कामेडी और गंभीरता का कारण बनती हैं।
सधा हुआ मैसेजः फिल्म देश की मौजूदा शिक्षा व्यवस्था के साथ-साथ हिंदी और अंग्रेजी को लेकर देश में बने दोहरे रवैये पर कड़ा प्रहार करती है। यह बताती है कि कैसे मां-बाप को यह डर सताता है कि बच्चा हिंदी माध्यम से पढ़ाई करेगा तो अंग्रेजी नहीं सीख पाएगा। अगर कोई उससे अंग्रेजी में बात करेगा तो वह खुद को हीन समझेगा और उसकी रूह कांप उठेगी। फिल्म की हिरोइन का यह संवाद ...इस देश में अंग्रेजी जुबान नहीं, क्लास (वर्ग) है राज क्लास.. इस क्लास में घुसने के लिए एक अच्छे अंग्रेजी स्कूल में पढ़ने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है. अंग्रेजी की अहमियत को दरसाता है। फिल्म के कुछ दृश्य जैसे स्कूलों में स्वीमिंग, घुडसवारी सिखाने जैसे इंतजाम जो उनके फाइव स्टार बन जाने का खुलासा करते हुए पैसे के बोलबाले पर चोट करते हैं तो स्कूलों के बाहर लगी लंबी लाइन जैसे दृश्य मां-बाप की बेबसी को बयां करते हैं। आरटीई के तहत गरीब कोटे की सीटों का महंगे स्कूल कैसे बंदरबाट करते हैं इस पर भी चोट की गई है।
नएपन का अभावः हिंदी मीडियम भले ही शिक्षा-व्यवस्था के काले चेहेरे और आरटीई के तहत दाखिले की व्यवस्था पर चोट करती हो,लेकिन फिल्म में नएपन का अभाव है। फिल्म में दिखाई गई ऐसी कोई बात नहीं है जो आप पहले  से न जानते हों। ऐसा लगता है कि निर्देशक साकेत चौधरी किसी जल्दी में थे, इसीलिए उन्होंने सिर्फ मुद्दों को छुआभर है। बिना पर्याप्त  शोध के एक गंभीर विषय को फिल्म में गुथ डाला। अगर ठीक से पड़ताल की गई होती तो उनसेस स्कूलों की राजनीति, नेताओं-नौकरशाहों का गठजोड़ जैसे तथ्य नहीं छुप पाते।
कलाकारों ने संभालाः अभिनेता इरफान खान के भावपूर्ण अभिनय और संवाद अदायगी के सभी कायल हैं। अन्य  फिल्मों की तरह इसमें भी उन्होंने अपनी इन खूबियों का बखूबी लोहा मनवाया है। पाकिस्तानी अभिनेत्री सबा कमर के साथ उनकी जोड़ी जमी है। इरफान ने चांदनी चौक के पैसे वाले व्यापारी राज बत्रा और सबा ने उनकी नकचढ़ी लेकिन बच्ची के लिए परेशान मां मीता का रोल निभाया है। इन दोनों के बीच अभिनेता दीपक डोबरियाल ने श्याम के रूप में अपनी दमदार उपस्थित दर्ज कराई है। इसे यूं भी कह सकते हैं कि श्याम की एंट्री के बाद ही फिल्म उड़ान भरती दिखती है। कंसलटेंट के रूप में तिलोत्तमा शोम ने भी प्रभावित किया है। हालांकि फिल्म में नेहा धूपिया, अमृता सिंह और संजय सूरी सिर्फ खानापूर्ति ही करते नजर आए हैं।

दूसरी फिल्मों से अलगः देश की शिक्षा व्यवस्था को लेकर अब तक कई फिल्मे बन चुकी हैं। इनमें राजू हिरानी की थ्री इडियट और तारें जमीं पर का नाम सबसे पहले आता है। दोनों फिल्में जिस तरह से हंसी-हंसी में पढ़ाई जैसे गंभीर विषय पर बड़ा सबक देती हैं, वैसा हिंदी मीडियम में नहीं है।इसके अलावा फिल्म इंग्लिश-विंग्लिश की तरह अंग्रेजी नहीं आने की कसक को भी मां-बाप में पूरी तरह नहीं उभार पाई। इसके बावजूद निर्देशक साकेत चौधरी की  कोशिश को नकारा नहीं जा सकता। खासकर गरीबों के कोटे की सीट को अमीरों द्वारा खा जाने की प्रवृत्ति पर प्रहार करने में वह कामयाब रहे हैं। 

Thursday, May 4, 2017

सलमान की ट्यूबलाइट चमकी



अभिनेता सलमान खान की ट्यूबलाइट गुरुवार को चमकी।  भरपूर रोशनी बिखेरने से पहले की ट्यूबलाइट की यह चमक ऐसी थी कि कुछ ही घंटों में प्रशंसकों के आंखें चौंधियाने लगी। रात नौ बजे फिल्म ट्यूबलाइट का पहला टीजर जारी किया गया। यूट्यूब पर पर कुछ ही घंटों में इसे लाखों लोगों ने देखा। रात दो बजे तक दर्शकों की संख्या 11 लाख 19 हजार 542 के आंकड़े पर पहुंच चुकी थी। यही नहीं अनकट टीजर और ट्यूबलाइट पर रिएक्शन जैसे कुछ और वीडियों को भी हजारों की तादाद में लोग देख चुके थे। ट्यूबलाइट पर सल्लू के चाहने वालों का यह रेस्पांस चौकाता नहीं है, क्योंकि पिछले पांच दिनों से वह खुद प्रशंसकों को इसकी जानकारी दे रहे थे। इसके लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया। अपने टिवटर हैंडल से हर दिन एक ट्वीट कर रहे थे। फिल्म के पोस्टर के साथ चुटीले अंदाज में सल्लू मियां का कमेंट होता था। इन ट्वीट को ट्यूबलाइट के आफिशयल टिवटर हैंडल से भी रिट्वीट किया जा रहा था।

सलमान के अकाउंट से ट्यूबलाइट टीजर प्रमोशन का पहला ट्वीट 29 अप्रैल को आया।  इसके साथ जारी पोस्टर में बस से झांकते सल्लू मिया सलाम ठोकते दिखे । साथ ही उन्होंने लिखा- कहीं जा नहीं रहा हूं, आपके पास आ रहा हूं. बस 5 दिन में। अगले दिन पहाड़ी पर आसमान की ओर हाथ उठाए खड़े दो युवकों के फोटो (फिल्म का सीन) को टैग करते हुए लिखा-मजा आएगा...सिर्फ चार दिन बाकी। इसके बाद बस की छत पर हाथों में हाथ डालकर बैठे सलमान और अरबाज का फोटो पोस्ट किया गया। साथ ही सलमान ने लिखा-दो भाई आ रहे हैं—बस दो दिन में।सिर्फ एक दिन बाकी के संदेश के साथ एक और फिल्मी फोटो अगले दिन जारी किया गया। सलमान इसमें भीड़ में हाथ उठाए हुए दिख रहे थे। चार तारीख को सल्लू मियां ने पांच दिन जारी किए गए पोस्टरों का कोलाज बनाकर उन्हें पोस्ट किया और ट्वीट कर बताया कि बस थोड़ी देर और...आ ही रहा हूं। ट्यूबलाइट का टीजर आज रात 9 बजे। इसके साथ कबीर खान, अमर बुटाला और एसके फिल्म को टैग किया गया। ठीक नौ बजे टीजर जारी होते ही सलमान ने जल जा, जल जा..जल गया लिखते हुए ट्वीट किया। फिल्म का टीजर जारी करने का यह अंदाज पहले की ही तरह चुटीला था। फिल्म के टीजर का प्रशंसकों को किस बेसब्री के साथ इंतजार था इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रोज सलमान के ट्वीट हजारों की संख्यां में लाइक किए गए और इससे ज्यादा बार इन्हें रिट्वीट किया गया। टीजर को मिल रही इस लोकप्रियता से फिल्म को लेकर लोगों में बन रहे रोमांच का अंदाजा बखूबी लगाया जा सकता है। हो भी क्यों न आखिर इस बार भी कैमरे के सामने और कैमरे के पीछे की सलमान और कबीरखान की हिट जोड़ी जो एक साथ आ रही है।  ट्यूबलाइट ईद पर रिलीज होगी।  

Monday, May 1, 2017

अंडे पर ही होगी उसकी पूरी जन्मकुंडली

अंडे पर ही होगी उसकी पूरी जन्मकुंडली
पहले मुर्गी आई या अंडा इस सवाल का जवाब आज तक अच्छे-अच्छे तुरर्मखां भी नहीं दे सके। कोई कहता है कि पहले अंडा आया और इससे मर्गी जन्मी, लेकिन अंडा दिया किसने ? जाहिर है पहले मुर्गी आई। पीढी-दर-पीढी मथ रहे इस सवाल पर अब ज्यादा दिमाग खपाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि अंडा कब आया यह जानना आपके लिए चुटकी बजाने जितना आसान हो जाएगा।
दरअसल सरकार जल्द ही ऐसी व्यवस्था करने जा रही है जिससे अंडा अपनी पूरी जानकारी खुद ग्राहक को देगा। जैसे कब उसका जन्म हुआ और उसकी पौष्टिकता कितनी है। अंडों की गुणवत्ता को लेकर आ रही शिकायतों के मद्देनजर सरकार जल्द  यह कदम उठाने जा रही है। इसके तहत अब अंडे पर मुहर लगेगी, जिसमें उसके जन्म की तारीख लिखी होगी। अंडा कितना सेहतमंद है यह भी आपको आसानी से पता चल जाएगा। सरकार इसके लिए एक निशान बनाएगी। आर्गेनिक का यह निशान इस बात की गारंटी होगा कि सेहतमंद मुर्गी ने ही यह अंडा दिया है। अंडा देने वाली मुर्गी को सिर्फ जैविक दाना ही दिया गया है, इसके लिए भी यह निशान होगा। दरअसल पोल्ट्री फार्म ज्यादा उत्पादन के लालच में मुर्गियों को एंटीबायोटिक देते हैं। इससे उनकी सेहत पर तो असर पड़ता ही है अंडों की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। अंडों में एंटीबायोटिक, एफलाटाक्सिन और माइक्रोएब्स मिलने के बाद ही सरकार अंडों की गुणवत्ता के मानक तय करने की दिशा में सक्रिय हुई है। माइक्रोएब्स कई बीमारियों जैसे फ्लू और खसरे का कारण बनते हैं। एफलाटाक्सिन बैहद विषैले होते हैं और कैंसर को जन्म देते हैं। देश में वर्ष 2017 में करीब 55.11 बिलियन अंडों का उत्पादन हुआ। कुल उत्पादन में पोल्ट्री फार्म की हिस्सेदारी 75 प्रतिशत है।

Friday, April 28, 2017

सियामी से रनवीर तक कई को कास्टिंग काउच का शिकार बनाने की कोशिश


रनवीर सिंह के साथ सियामी

फिल्म निर्माता मधुर भंडारकर की हत्या की साजिश में तीन साल कैद की सजा पाने वाली मॉडल प्रीति जैन यौन शोषण का आरोप लगा फिल्म इंडस्ट्री में कास्टिंग काउच का तूफान ला चुकी हैं। प्रीति ने मधुर पर 2004 में बलात्कार का आरोप लगाया था, जो कोर्ट में साबित नहीं हो सका। लेकिन इसने चमचमाते बॉलीवुड की कास्टिंग काउच की गंदगी को सतह पर ला दिया था। वैसे यह पहली बार नहीं था। इससे पहले भी बॉलीवुड में काम के एवज में सेक्सुअल फेवर मांगने वालों के जब तक किस्से सामने आते ही रहते थे। कुछ अभिनेता और अभिनेत्रियों ने खुलकर तो कुछ ने दबी जबान में ऐसे सेक्सुअल फेवर के प्रस्ताव मिलने की बात भी मानी। इनमें सबसे नया नाम है फिल्म मिर्जिया से बॉलीवुड में दस्तक देने वाली अभिनेत्री सियामी खेर। सियामी ने कहा कि अपने संघर्ष के दिनों में वह ऑडिशन देने के लिए घंटों लाइनों में लगती थी। अपनी बारी के इंतजार के दौरान उनका पाला कई बार ओछी मानसिकता वाले डायरेक्टरों से पड़ा।  16 साल की उम्र से मॉडलिंग कर रही सियामी ने कहा कि शुक्र है पहला फिल्मी ब्रेक मिलने से पहले ही मैने इंड्रस्ट्री का यह स्याह रूप भी देख लिया।
अभिनेत्री कंगना रनौत, टिस्का चोपड़ा, सुरवी चावला भी कास्टिंग काउच को लेकर खुलासा कर चुकी है। अभिनेता रनवीर सिंह, आयुषमान खुराना, प्रियांशु चटर्जी ने भी कई मौकों पर बातचीत के दौरान ऐसे ओछे प्रस्ताव मिलने का खुलासा किया है। फिल्म इंड्रस्ट्री की क्वी ‘क्वीन’ कंगना ने बताया था कि एक बार उनसे यौन सुख संतुष्टि का प्रस्ताव दिया गया था। कंगना ने कोई समझौता करने के बजाय प्रस्ताव को खारिज कर दिया। अभिनेत्री सुरवीन चावला भी दक्षिण भारतीय फिल्मों में काम के दौरान कास्टिंग काउच का शिकार होने से बची। सुरलीन ने कहा कि मैने ऐसा प्रस्ताव स्वीकार करने के बजाय अपनी प्रतिभा और मेहनत के बूते काम हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत की। आमिर खान, प्रकाश झा, नागेश कुकनूर समेत कई दिग्गजों के साथ काम कर चुकीं और विभिन्न भाषाओं में 45 से ज्यादा फिल्मे करने वाली अभिनेत्री टिस्का चोपड़ा ने भी कहा था कि ऐसे प्रस्ताव मिलते हैं। लेकिन आपको काम पर भरोसा करते हुए इन्हें सख्ती के साथ खारिज कर देना चाहिए। 




कंगना रनौत

सुरवीन चावला

आयुषमान खुराना

अभिनेता रनवीर सिंह ने भी स्वीकारा था कि वह भी एक बार कास्टिंग काउच के शिकार होते-होते बचे। ऐसा ही कुछ फिल्म विक्की डोनर से अपनी धाक जमा चुके अभिनेता आयुषमान खुराना के भी साथ हुआ। उन्हें भी एक डायरेक्टर ने सेक्सुअल फेवर के लिए अप्रोच किया, लेकिन उन्होंने कड़ाई से इसे खारिज कर दिया। तमाम अभिनेता और अभिनेत्री कास्टिंग काउच की सच्चाई को स्वीकार करते हैं, लेकिन उनका यह भी कहना है कि यह आप पर निर्भर करता है कि आप क्या करते हैं? उन्हीं लोगों का इस्तेमाल संभव है जो इसे होने देते हैं।

Friday, April 14, 2017

यहां सीटी सुनते ही भाग जाते हैं खुले में शौच करने वाले




स्वच्छता एक आदत है और लोग इस आदत को अपनाएं इसके लिए खूब  मेहनत करनी पड़ती है। यह मेहनत तब कई गुना बढ़ जाती है जब खुले में शौच जैसी आदत को छुड़वाना हो। लेकिन जहां चाह वहां राह। स्वच्छता अभियान में शामिल ग्राम पंचायतों ने गंदगी फैलाने की आदत का भी तोड़ ढूंढ निकाला है। ऐसी ही छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के बतौली विकासखंड की ग्राम पंचायत बिरिमकेला। पंचायत ने खुले में शौच करने वालों को रोकने के लिए सीटी से लैस लोगों का एक दल तैनात कर दिया है। नीली वर्दीधारी12 लोगों का यह दल खुले में शौच करने वालों को सीटी बजाकर आगाह करता है। इसके बावजूद नहीं मानने वाले लोगों से 500 रुपये जुर्माना वसूला जाता है। इस रकम को पंचायत के स्वच्छता कोष में जमा कराया जाता है।
ग्राम पंचायत अध्यक्ष फूलकुंवर कहती हैं कि स्वच्छता की आदत को बनाए रखने के लिए सतत निगरानी की जरूरत  होती है। इसलिए स्वच्छता निगरानी टीम भी बनाई गई हैं। केवल बिरिमकेला गांव में ही नहीं, पूरे प्रखंड के सभी गांवों में इनका गठन किया गया है। स्वच्छता अभियान में कोई ढिलाई नहीं आए इसका भी उपाय किया गया है। हर माह की 10 तारीख को ये टीमें अपने-अपने गांवों में स्वच्छता की स्थिति को लेकर बैठक करती हैं। ये ग्राम पंचायतें उदाहरण हैं कि यदि कुछ करने की ठान लें तो मुश्किलें रास्ता नहीं रोक पाएंगी।

                                             एक और वज्रपात, नीरज भैया को  लील गया कोरोना  दिल के अंदर कुछ टूट सा गया है, ऐसा कुछ, जिसका जुड़...