Thursday, February 16, 2017

पढ़ना जरूरी है, पर सोच-समझकर


सबके पास सिर्फ 24 घंटे हैं। इसी में से समय निकालना होता है। पत्रकार हो कायदे का पढ़ो-लिखो, नहीं तो धीरे-धीरे खत्म हो जाओगे।‘ ‘हिन्दुस्तान’ में अगस्त 2016 में हुई डोसा कनेक्शन मीट में प्रधानसंपादक श्री शशिशेखर जी के इन शब्दों ने गहरी चोट की। ठान लिया कि हर माह एक किताब जरूर पढूंगा। शौक भले ही कहानी और उपन्यास का रहा हो, लेकिन इनके बजाय कुछ और पढूंगा। ऐसा कुछ जो मेरी कमियों को दूर करने और मुझमें बदलाव लाने में मददगार साबित हो। लेकिन पढूं क्या? यह सवाल मुझे मथने लगा। मन में आया बुकस्टाल पर जाकर किताब छांटी जाए, लेकिन तुरंत ही यह विचार खारिज हो गया। जेब अभी इसकी इजाजत नहीं दे रही थी। पढ़ना तो तब भी है, कोई और रास्ता निकाला जाए। दोस्तों से किताब उधार मांगकर पढ़ी जाए, लेकिन सवाल फिर वही, किससे? दो-तीन दिन इसी जद्दोजहद के बीच गुजरे और फिर एक दिन पहुंच गया कादिबंनी के सहयोगी संपादक श्री अजय कटारा जी के पास।
अचानक मुझे अपने केबिन में दाखिल होता देख कटारा जी चौंक उठे। मैने नमस्कार किया तो बोले-अरे पवनेश तुम यहां कैसे? दरअसल, कटारा जी का केबिन दफ्तर के ग्राउंड फ्लोर पर था. पहली मंजिल पर जब भी मिलते तो मैं उनसे कहता कि आपसे मिलने आना है, लेकिन जनरल डेस्क की  व्यस्तता के चलते जा नहीं पाता था। जब भी वह ऊपर मिलते तो कहते -अरे आए नहीं। ऐसे में उनका चौंकना वाजिब था। अपने केबिन में किताबों से घिरे हुए कटारा सर से मैने अपनी मनस्थिति बयां कर डाली। उन्होंने कहा, देखों, और छांट लो जो पसंद हो। जो पढ़ना चाहे ले लो, लेकिन शर्त यह है कि किताब पढ़नी होगी। इसी वादे के साथ तुम किताब ले जा सकोगे।‘ मैने वहां से किताब चुनी-‘इरोम शर्मिला और आमरण अनशन।‘ इरोम के बारे में मुझे जानने का मौका मिलेगा यह सोचकर मैने यह किताब ली। इसी के साथ शुरु हुआ फिर से किताब के साथ खुद को जोड़ने का सिलसिला। पर हाय री किस्मत! बोहनी ही खराब हो गई। शुरु के दो-चार पेज पढ़े, फिर बीच  से पढ़ी, अंत के भी कुछ पेज पढ़े पर यह समझ ही नहीं आया कि यह किताब क्यों लिखी गई है? इसे पढ़कर हासिल क्या होगा? सामान्य जानकारी के अलावा यह सिर्फ लेखक के रोजनामचे और इरोम के संघर्ष को लेकर अखबारे के विश्लेषण जैसी थी। फिर भी मैने खुद को इसमें खपाया लेकिन तीन दिन बाद ही हिम्मत जवाब दे गई। इसी  के साथ किताबी सफर शुरू होते ही झटके के साथ रुक गया।

(फिर से  कैसे पकड़ी पढ़ने के शौक ने रफ्तार और क्या पढ़ा ये अगली बार..)

Sunday, February 5, 2017

एक रुपया और रिश्ता


एक रुपये में आप क्या-क्या ले सकते हैं. जरा सोच कर देखिए। एक या दो टाफी, एक माचिस। एक छोटा कोने वाला समोसा. ज्यादा दिमाग पर जोर डालेंगे तो एक दो चीज और याद आ सकती है। य़ानी खरीद सकने लायक एक रुपये में कोई बहुत ज्यादा विकल्प नहीं है। पर एक बेहद बड़ी चीज सिर्फ इस एक रुपये में आसानी से तय़ हो जाती है। वह भी अबसे नहीं सालों से । जब इसकी कीमत होती थी तब भी और अब जब इसकी कीमत मामूली बची है तब भी।
नहीं समझे..बताता हूं. य़ह है रिश्ता। जी हां। पश्चिमी यूपी और हरियाणा के एक बेहद बड़े हिस्से में एक रुपये में ही रिश्ते तय हो जाते हैं। यह दहेज को मात देने का शायद यहां का सबसे पुराना और आजमाया हुआ नुस्खा है।  लेन-देन के नाम पर सिर्फ रुपये की बात तय कर वर-वधू पक्ष अपनी और से यह पक्का कर देते है कि इसके अलावा और कुछ नहीं होगा। हां, जहां तक बारात के स्वागत-सत्कार और  दूसरी बाते हैं उनमें वधू पक्ष स्वतंत्र है वह अपनी सामर्थ्य से जो चाहे करे। इसी परंपरां का मैने कई बार निर्वहन होते देखा है। आज भी ऐसे ही एक विवाह के बारे में सुना। जिसमें एक रुपये के रिश्ते की बदौलत न केवल एक बेटी की विदाई हुई, बल्कि दोस्तों को उसमें नवदंपत्ति के लिए फ्रिज, सिलाई मशीन, अलमारी जैसेे गृहस्थी के सामान अपनी और से देते हुए देखा। कितना अजब है न अपना यह समाज जिसमें शादी में करोड़ो खर्च कर अपनी शान बघारने वाले लोग हैं तो साथ ही एक रुपये के रिश्ते की व्यवस्था भी है । जिसके तहत मां-बाप सम्मान के साथ बेटी के हाथ पीले करने में भी समर्थ हैं।













Saturday, November 8, 2008

भारतीय मीडिया का ओबामा पर न्योछावर होना

नस्लवाद के दंश से जूझ रहे अमेरिका में बराक हुसैन ओबामा का अश्वेत राष्ट्रपति के रुप में चुना जाना बेशक एक बेहद बड़ी घटना है। इस कदम के जरिये दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र अमेरिका ने एक नया पड़ाव तय किया है। लेकिन ओबामा के निवार्चन को लेकर भारतीय मीडिया ने जो उत्साह दिखाया वह हैरान करने वाला है। क्या समाचार पत्र और क्या न्यूज चैनल कवरेज करते हुए सभी इस कदर बौराए कि उन्हें होश ही नहीं रहा कि क्या लिखे और क्या दिखाएं। समाचार पत्र ओबामा विशेषांक में तब्दील हो गए तो न्यूज चैनल ओबामा पुराण के वाचन में तल्लीन। खबरों के जरिये आम आदमी की दुनिया बदल देने का दावा करने वाले समाचार चैनल चार नवंबर को दिन भर ओबामा के स्तुतिगान में जुटे रहे तो पांच नवंबर को अखबार ओबामामय थे। इस फेर में अन्य जरूरी खबरें छूटी तो इसका किसी को कोई अफसोस दिखाई नहीं दिया। ओबामा की इतनी कवरेज का कारण कोई तो समझाओ। ठीक है, अमेरिका विश्व का दादा है और उसके यहां मची हलचल का प्रभाव पूरे विश्व पर पड़ता है। अमेरिका में फिलहाल छाई आर्थिक मंदी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था के डावांडोल होने के बाद भारत-चीन समेत दुनिया के तमाम देशों की अर्थव्यवस्था कंपित हो उठी है। ओबामा का राष्ट्रपति चुना जाना भी बड़ी घटना है क्योंकि देर-सबेर सभी देशों पर इसका असर पड़ेगा। लेकिन यह विशुद्धरूप से राजनीतिक और आर्थिक होगा। इस लिहाज से इसका विश्लेष्ण होना चाहिये था। पर निवार्चन के तुरंत बाद यह चीर-फाड़ उचित नहीं कही जा सकती, क्योंकि ओबामा २० जनवरी,२००९ को देश की बागडोर संभालेंगे। अभी तक उन्होंने जो भी कहा वह चुनाव प्रचार के दौरान दिए गए भाषण थे। शासन में आने के बाद ये कितने सही साबित होंगे यह वक्त बताएगा। उनकी नीतियों और रीतियों का सही मायने में पता भी तभी चलेगा। फिर यह कौन नहीं जानता कि अमेरिका हर मायने में अमेरिका है। वहां चाहे ओबामा के पूर्वगामी डैमोक्रेट बिल क्लिंटन का शासन हो यहा रिपब्लिकन जार्ज बुश का। हर हाल में अमेरिकी स्वार्थ और हित ही सर्वोपरि हैं। भारतीय मीडिया में ओबामा के छाए रहने के बाद जो टीस उभरी वह थी अपने यहां होने वाले चुनाव की कवरैज। भारतीय मीडिया ने जितना ओबामा के बारे में दिखाया-सुनाया उसके बाद हम ओबामा के तो रोम-रोम के बारे में जान गए, लेकिन अपने नेताओं को लेकर भी क्या हमारी यही स्थिति है????? पहले सिख प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पहली महिला राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के बारे में भी क्या भारतीय मीडिया ने हमे ऐसा ही मौका मुहैया कराया था??? शायद नहीं। जबकि भारत में चैनल देखने और अखबार पढ़ने वाले करोड़ों लोग ऐसे हैं, जिनका अमेरिका के बारे में ज्ञान बेहद सामान्य है। उनका सरोकार अपना भारत है सात समुंदर पार का अमेरिका नहीं। इसलिए ओबामा के बारे में इतनी उल्टी करने से पहले भारतीय मीडिया को इन करोड़ों लोगों के बारे में भी सोचना चाहिए था।

यू कान्ट, बराक हुसैन ओबामा !

गोलमेज सम्मेलन के लिए महात्मा गांधी लंदन गये तो लौटते हुए फ्रांस भी गये थे. उनके सामने प्रस्ताव आया कि आपको अमेरिका भी जाना चाहिए. बार-बार दबाव डालने के बावजूद महात्मा ने अमेरिका जाने से मना कर दिया. जब उनके पूछा गया कि आप मना क्यों कर रहे हैं तो उन्होंने कहा था अभी वह वक्त नहीं आया है कि मैं अमेरिका जाऊं. महात्मा गांधी भले ही अमेरिका न गये हों लेकिन बराक ओबामा के िनजी दफ्तर में महात्मा गांधी की फोटो लगी हुई है. आर्थिक और सामाजिक भ्रंस के कगार पर खड़े अमेरिका में ओबामा का राष्ट्रपति बनते ही क्या वह वक्त आ गया है कि महात्मा गांधी जैसी चेतना कह सके कि हां, अब वह वक्त आ गया है जब मुझे अमेरिका जाना चाहिए?नहीं, वक्त तो शायद अभी भी नहीं आया है. पिछले ४८ घण्टों से भारतीय मीडिया ने जिस तरह का रूख अख्तियार किया है उससे दो बातें साफ हो रही हैं. एक, अमेरिका ने लंबे समय से भारत में जो बौद्धिक पूंजी निवेश किया था उसका परिणाम सामने आ रहा है और दो, भारत में एक बड़ा अमरीकी फोटोकापी वर्ग खड़ा हो गया है जो हर लिहाज से अमेरिका को भारत से बेहतर मानता है. बात जब लीडरशिप की हो तब भी. दिल्ली के अमेरिकन सेन्टर और दूतावास में वहां के स्थानीय निवासियों के लिए कुछ सुविधाएं उपलब्ध करवायी गयी हैं कि अमेरिकी इस ऐतिहासिक क्षण में अपने देश के साथ जुड़ सकें. लेकिन अगर आप वहां जाएं तो पायेंगे कि वहां अमेरिकियों से ज्यादा अमेरिकी मानसिकता के भारतीयों का जमावड़ा है. वे अोबामा में "होप" की तलाश कर रहे हैं. "यस, वी कैन" की शब्दावली ऐसे रट रहे हैं मानों अमेरिका नहीं भारत में राष्ट्रपति का चुनाव पूरा हुआ है. माफ करिए, ये इतनी बड़ी समझ वाले लोग नहीं है जो विदेश नीति के जानकार हैं और इस ऐतिहासिक मौके पर भारत की भविष्य की रणनीतिक को देखते हुए योजनाएं बना रहे हैं. ये अस्तित्वहीन लोग हैं. ऐसे चमगादड़ जो मौका मिलते ही किसी भी डाल से चिपक जाते हैं.
अमेरिका ने लंबे समय से जो बौद्धिक पूंजीनिवेश किया था ये जमात उसी की पैदाईश है. मीडिया में भी वैसे ही लोगों की भरमार है जो अमेरिका को अपना स्वर्ग मानते हैं, इसलिए भांति-भांति से अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव जैसी एक खबर को २४ घण्टे का अभियान बना दिया गया है. महात्मा गांधी अगर इस मानस के होते तो वे भी आज के नव-धनाढ्यों के स्वर्ग अमेरिका जाते और दलील देते कि क्योंकि आज हमारे देश में अमेरिका प्रेमियों की संख्या बहुत बढ़ गयी है इसलिए कूटनीतिक स्तर पर अमेरिका जाने में कोई बुराई नहीं है. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया था. शायद इसीलिए वो महात्मा गांधी थे क्योंकि वे अपनी जमीन पर खड़ा होना जानते थे. और शायद इसीलिए ओबामा के निजी कार्यालय में महात्मा गांधी की तस्वीर भी लगी हुई है. आज जो लोग अमेरिकी चुनाव को इस तर्क के साथ भारतीय जनमानस तक पहुंचा रहे हैं कि अमेरिका दुनिया का शीर्षस्थ देश है और भारत उभरता अमीर तो उसे अमीरी का यह प्रदर्शन करना ही चाहिए, वे बौद्धिक रूप से लकवाग्रस्त हैं. यह जानते हुए कि अमेरिका भ्रंस पर आ खड़ा हुआ है और उस भ्रंस में धंसने से पहले अमेरिका ओबामा के रूप में अंतिम सांस ले रहा है. यह अमेरिका तो जाएगा. अगर ओबामा सफल होते हैं तो अमेरिका वह अमेरिका नहीं रह जाएगा जो अब तक था. फिर भी हमारी मीडिया जिस अमेरिका के प्रभाव में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव को विश्लेषण कर रही है वह वही अमेरिका है जिसके दुष्प्रभाव में खुद अमेरिका और पूरी दुनिया है.
भारत में आज बीपीओ और काल सेंटरों के जरिए कोई १५००० करोड़ का कारोबार हो रहा है. इसमें बड़ा हिस्सा अमेरिका का है. यही हाल साफ्टवेयर उद्योग का है. इन दो क्षेत्रों के अलावा एक तीसरा क्षेत्र भी है जहां अमेिरका सबसे बड़ा आयातक है. वह है आध्यात्मिक आयात. ओबामा का उदय पिछले सौ-सवा सौ साल में अमेरिका गये आध्यात्मिक उत्पादों का परिणाम है. ओबामा कोई व्यक्ति नहीं बल्कि उस मानसिकता का प्रतीक हैं जो वर्तमान अमेरिकी जीवन शैली को तिलांजलि देना चाहते हैं. वे उस नर्क से बाहर आना चाहते हैं जिसे अब तक विकास और आधुनिकता के नाम पर ढोंग की तरह ढोते रहे हैं. अपने पूरे चुनाव अभियान के दौरान ओबाना ने आध्यात्मिक पूंजी को सहेजने की सबसे जोरदार वकालत की थी. यह आध्यात्मिक पूंजी निजी तौर पर आंतरिक उन्नति और समाज के तौर पर शोषणमुक्त समाज का रास्ता दिखाती है. क्या भारतीय मीडिया ने इस लिहाज से ओबामा की जीत को देखा है? अगर हां तो वे तत्व कहां हैं जो अमेरिका को ओबामा तक ले आये हैं और अगर नहीं तो हमारी वह भारतीय दृष्टि कहां चली गयी जो महात्मा गांधी के पास थी. बराक हुसैन ओबामा केवल अमेरिका के लिए होप नहीं है. वे अमेरिका के फोटोकापी भारतीयों के लिए भी होप दिखाई दे रहे हैं. अमेरिकी और अमेरिका के फोटोकापी भारतीय दोनों ही यह भूल रहे हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति दुनिया का सबसे ताकतवर व्यक्ति होने के बावजूद अमेरिकी व्यवस्था के सामने सबसे कमजोर व्यक्ति है. वह सिर्फ रबर स्टैम्प है जिसे अमेरिकी नेशनस्टेट बहुत लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर इस्तेमाल करता है और फेंक देता है. बराक ओबामा की मशहूर पुस्तक "ओडेसिटी आफ होप" उनके उम्मीदों के दुस्साहस के बारे में ही होगी. शायद इसीलिए वे अपने भाषणों में "यस, वी कैन" का नारा लगवाते हैं. ठीक वैसे ही जैसे कोई नेता अपनी जनता में उम्मीद की किरण भर सकता है वे भरते हैं. लेकिन यह नारा अमेरिका के उस टूट चुके मनोबल को भी दर्शाता है जो उसे इस भ्रंस तक खींच लाया है. हो सकता है अमेरिका में उपभोग के सामानों की कोई कमी न हो और लोग "सुख" से जी रहे हों लेकिन सुख को अनुभव करनेवाली जो आत्मा होती है क्या वह अमेरिका के पास बची है? क्या अमेरिका और अमेरिका के फोटोकापी भारतीयों को इस बात का तनिक अंदाजा है कि बराक ओबामा कुछ नहीं कर सकते. चुनावी वादे और नारे आकर्षक व्यक्तित्व के जरिए आप उस प्रतिष्ठान तक जरूर पहुंच सकते हैं जिसे सत्ता कहते हैं लेकिन सत्ता में आने के बाद आप सत्ता के हिस्से होते हैं. अमेरिकी नेशन स्टेट ओबामा क्या इराक से सेना हटाने की इजाजत देगी? क्या ओबामा में इतनी हिम्मत है कि वे इराकी तेल कुओं पर अमेरिकी कंपनियों के अवैध कब्जों को खत्म करवा सकें? क्या ओबामा दक्षिण मध्य एशियाई देशों की नीतियों में बदलाव ला सकते हैं. क्या वे इरान की नीतियों में बदलाव करेंगे? क्या वे अमेरिकी कंपनियों पर लगाम लगाने की कोशिश करेंगे जो पूरी दुनिया में घूम-घूम कर आम आदमी का खून चूसती हैं? क्या वे दूसरे देशों में नीतिगत हस्तक्षेप को बंद करवा देंगे? अगर ऐसा कुछ करते हैं तो फिर अमेरिका का वह रूतबा ही खत्म हो जाएगा जिस रूतबे के कारण भारत के टुंटपुजिया न्यूज चैनल भी लाईव रिपोर्टिंग करने अमेरिका जा पहुंचे हैं. क्या अमेरिका एक नेशन स्टेट के रूप में अपना रूतबा घटाकर बराक ओबामा को स्वीकार करने के लिए तैयार है?
शायद नहीं। कभी नहीं. बराक ओबामा जिस दिन अमेरिका के राष्ट्रपति की शपथ लेंगे उस दिन वे अमेरिका के राष्ट्रपति होंगे और उन्हीं नीतियों को समर्थन करेंगे जिन नीतियों के कारण अमेरिका अमेरिका बना हुआ है. अगर सत्ता प्रतिष्ठान में पहुंचकर बदलाव संभव होता तो महात्मा गांधी भी देश के पहले प्रधानमंत्री बन जाते. महात्मा गांधी शायद इस बात को समझते थे कि गांधी सत्ता में जाने के बाद महात्मा नही रह पायेगा. सत्ता का अपना एक चरित्र होता है, जिसे बदला नहीं जा सकता. निश्चित रूप से बराक ओबामा अमेरिका और अमेरिका के फोटोकापी भारतीयों के लिए उम्मीद की एक किरण हैं लेकिन तभी तक जब तक वे व्हाईट हाउस में नहीं पहुंचते. जिस दिन वे ह्वाईट हाउस के अंदर होंगे उस िदन उनके निर्णय भले ही ज्यादा संतुलित हों लेकिन दुनिया के लिए अमेरिका के चेहरे को रत्तीमात्र भी नहीं बदल सकते. अगर उन्होंने ऐसा करने की कोशिश की तो अमेरिका ओबामा को भी बर्दाश्त नहीं करेगा. यही अमेरिकी नेशन स्टेट का चरित्र है और यही उसकी सफलता का राज भी. (मित्र विनोद पाठक द्वारा प्रेषित जिन्हें यह मेल उनके मित्र संजय तिवारी ने भेजा था )

Wednesday, September 24, 2008

राजनीति के मकड़जाल में फंसा आतंकवाद निरोधी कानून

आपको याद हो तो दिल्ली में हालिया बम धमाकों के बाद प्रधानमंत्री ने खुद खुफिया तंत्र की चूक स्वीकार की थी। साथ ही पोटा को लागू करने के भी संकेत दिए, लेकिन इस पर तंरत ही हाय तौबा शुरू हो गई। अगले ही दिन सूचना प्रसारण मंत्री ने इसका खंडन कर दिया कि सरकार पोटा को लागू करने जा रही है। लगे हाथ उन्होंने सख्त कानून की वकालत कर भूसे पर लीपने जैसा प्रयास भी कर दिया। अब आज कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने राजग सरकार के समय हुई आतंकवादी घटनाओं को गिनाते हुए पोटा को विफल कानून करार दिया। सख्त कानून का राग अलापाते हुए राहुल ने यह भी कह डाला कि आतंकवाद से मजबूत इच्छा शक्ति से लड़ा जा सकता है। हाय रे लोकतंत्र, क्या बातों से मजबूत इच्छा शक्ति पाई जा सकती है। सरकार का नेतृत्व कर रही कांग्रेस के युवराज को क्या यह नहीं मालूम कि यह मजबूत इच्छा शक्ति किसी पड़ोसी देश से नहीं आएगी। सख्त कानून का निर्माण और उसे लागू करने की जिम्मेदारी उस केंद्र सरकार की ही है, जिसका प्रधानमंत्री उनकी पार्टी का है। साथ ही इसके लिए उस वोट बैंक की राजनीति को त्यागना होगा जो देश का बंटाधार कर रही है। यह सभी जानते हैं कि आतंकवादी किसी धर्म, जाति या संप्रदाय के नहीं होते। वे सिर्फ हत्यारे होते हैं। इसके बावजूद यह हमारे राजनेता ही हैं, जो अपनी बयानबाजियों से जांच एजेंसियों की मुश्किलें बढ़ा देते हैं। सिमी और इंडियन मुजाहिदीन की तुलना बजरंग दल और आरएसएस से करते हैं। जामिया नगर मुठभेड़ में आतंकियों की गिरफ्तारी के बाद वामपंथियों का बयान आता है कि पुलिस इस तरह से काम करें कि संप्रदाय विशेष खुद को अलग-थलग न महसूस करें। अब वामदलों से पूछा जाए कि इससे संप्रदाय विशेष के अलग पड़ने का क्या मतलब? जिसने जो बोया है वह तो काटेगा है। यदि आतंकवादी सबसे ज्यादा एक संप्रदाय के लोग ही निकल रहे हैं तो शिकंजा भी उसी संप्रदाय पर कसेगा। आप अपने बयानों से जहर क्यों घोल रहे हैं? देश हित से बड़ा कुछ नहीं होता। एक्स, वाई और जेड श्रेणी के मजबूत सुरक्षा कवच के सहारे अपने आप को सुरक्षित पा रहे नेतागण यह जान लें कि आज भले ही आतंकवादी गतिविधियों का शिकार निर्दोष लोग बन रहे हों, लेकिन ज्यादा समय तक वह खुद भी नहीं बच पाएंगे। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के हालात से इसे बखूबी समझा जा सकता है। आतंकवाद का भस्मासुर इन देशों में अब अपने रहनुमाओं को भी नही बख्श रहा है। कड़े सुरक्षा प्रबंधों के बावजूद आतंकवादी यहां बड़े नेताओं को ?अपना निशाना बना रहे हैं। बेनजीर अपनी जान गंवा चुकी है। हाल ही में ली मेरिएट होटल में हुए धमाके में राष्टपति जरदारी, प्रधानमंत्री गिलानी और सेनाध्यक्ष कियानी बाल-बाल बचे हैं। इस लिए भारतीय राजनीतिक दल इससे सबक लें और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को वोटबैंक की राजनीति से नहीं जोड़े। आतंकवाद पर सख्त प्रहार के लिए कड़ा कानून बनाएं। उसका दुरुपयोग होता है तो उसमें संशोधन करें और यह प्रक्रिया तब तक जारी रखें जब तक वह फुलप्रूफ नहीं बन जाएं। सिर्फ दुरुपयोग का राग अलाप कर कानून को खारिज नहीं करें। जब मानवाधिकारों का सबसे बड़ा पैरोकार अमेरिका नाइन इलेवन के बाद अपने यहां बेहद सख्त कानून बना उसे लागू कर सकता है तो बार-बार धमाकों से दहलने के बाद हम क्यों नहीं? अगर यह कहा जाए कि आतंकवाद निरोधी कानून पोटा राजनीति का शिकार हुआ है, तो यह बिल्कुल भी गलत नहीं होगा। कमियां पोटा में नहीं थी, उसे लागू करने वालों में है। आतंकवाद के खिलाफ बना यह कानून, पोटा, राजनीति का ऐसा शिकार हुआ कि उसके मकड़जाल से बाहर नहीं आ सका और बेहतर परिणाम देने से पहले ही दम तोड़ गया। आतंकवाद से लड़ने के लिए बने हथियार पोटा को नेताओं ने अपने स्वार्थों को साधने के हथियार में तब्दील कर दिया।
------पवनेश कौशिक

Tuesday, September 23, 2008

विश्वास है जरूरी

ग्रेटर नोएडा में इटली की बहुराष्टीय कंपनी के सीईओ की हत्या की घटना की जितनी निंदा की जाए वह कम है। कर्मचारियों ने जो किया उसे किसी भी कीमत पर सही नहीं ठहराया जा सकता। इस घटना के दोषियों को सजा मिलनी ही चाहिए। आखिर सभ्य समाज में हिंसा की भी विवाद का हल नहीं है। सभी मसले बातचीत से सुलझाए जा सकते हैं। इस घटना से नियोक्ता और कर्मी के संवेदनशील और भावुक रिश्ते को गहरा आघात पहुंचा है। लेकिन यह भी बिल्कुल सही है कि ऐसी घटनाओं का कारण इस भावुक रिश्ते के बीच पैदा हुई अविश्वास की खाई है। यह खाई दिनोंदिन चौड़ी होती जा रही है। इसका कारण दोनों पक्षों की एक-दूसरे से उम्मीदें हैं। यह पूरी होने के बजाय इनका दायरा बढ़ता ही चला जा रहा है। कर्मचारी हर सूरत में अपने द्वारा किए जा रहे काम यानि आउटपुट को बेहतर ठहराता है तो प्रबंधन उसमें हर बार और सुधार की और ही इशारा करता है। मालिक काम से संतुष्ट नहीं है, तो कर्मचारी दाम से। एक-दूसरे की प्रशंसा और प्रेरणा से संस्थान को प्रगति के मार्ग पर आगे ले जाने के उपाय न के बराबर नजर आते हैं। नियोक्ता और कर्मियों में दोषारोपण का सिलसिला ही चलता रहता है। यह ठीक नहीं है। ऐसा कर दोनों ही घाटे में हैं और रहेंगे। अच्छा हो कि नियोक्ता कर्मियों की स्थितियों और उनकी समस्याओं को सुलझाने के मामले में संजीदगी बरते। साथ ही कर्मचारी भी वह काम कर दें, जिससे नियोक्ता को कोई शिकायत नहीं रहे। वरना ऐसी घटनाएं होंगी और दोनों इसका खामियाजा उठाते रहेंगे। आज ग्रेटर नोएडा में जघन्या घटना हुई है कल गुड़गांव के हीरो होंड़ा में कर्मियों की पिटाई की घटना की पुनरावृत्ति होगी।

Sunday, September 21, 2008

सांप्रदायिक चश्मा उतारें

हर मुठभेड़ की तरह दिल्ली के जामिया नगर में हुई आतंकी मुठभेड़ को भी समुदाय विशेष के तथाकथित बुद्धिजीवी और इस वर्ग के रहनुमा मजहबी रंग देने से नहीं चूके। मुठभेड़ में दो आतंकवादियों की मौत को पुलिस का प्रायोजित कार्यक्रम करार दे दिया गया। मुठभेड़ के कुछ समय बाद ही टीवी पर दिखाई पड़ने वाले ज्यादातर स्थानीय चेहरे पुलिस पर आरोप लगाते हुए सुनाई दिए। बेर्शमी के साथ ये लोग जहां मारे गए आतंकियों को निर्दोष बता रहे थे वहीं, सभी मुठभेड़ों को संप्रदाय विशेष को परेशान करने वाला करार दे रहे थे। मुठभेड़ में इंस्पेक्टर एमसी शर्माऔर एक हेड कांस्टेबल को गोली लगना भी इनके लिए पुलिस का प्रोपेगेंडा था। पुलिस द्वारा शर्मा को गंभीर रूप से घायल बताए जाने के बावजूद सभी मुठभेड़ पर ही उंगली उठा रहे थे। दिल्ली के साथ-साथ यूपी में तो और भी बुरा हाल था। आजमगढ़ के सरायमीर में लोगों ने पकड़े गए आतंकी सैफ को सही बताते हुए हंगामा काटा और मीडिया के साथ मारपीट की। हर चीज को सांप्रदायिक चश्मे से देखने से आदी हो चुके देश के इन सम्मानित लोगों को अब क्या कहा जाए ? पुलिस को कठघरे में खड़ा करने और आतंकियों की पैरवी करने से पहले ये लोग थोड़ा इंतजार कर लेते तो इनका क्या बिगड़ जाता। पुलिस को मिले सुबूत दूध का दूध और पानी का पानी तो कर ही देते। और ऐसा हुआ भी। मुठभेड़ स्थल से मिले सबूतों ने दोनों को आतंकी साबित कर ही दिया। पर पुलिस पर उंगली उठाने वाले लोगों के क्षुद्र रवैये से तो साफ है कि देश और देशवासियों की सुरक्षा से इनका कोई सरोकार नहीं है। कट्टरपंथियों के हाथ की कठपुतली बन चुके ये लोग भी आतंकियों की श्रेणी में ही खड़े हैं। देश में आतंकवाद को बढ़ावा दे रहे हैं। आतंकी जहां अपनी वारदातों से देश को नुकसान पहुंचा रहे हैं, वहीं ये उन्हें प्रश्रय और उनकी पैरोकारी कर उनका सहयोग कर रहे हैं। आखिर ये लोग यह क्यों नहीं समझ पा रहे हैं, कि यह देश उनका अपना है। इसके बाहर इनका कोई सहारा नहीं है। आतंकी गतिविधियों में लगो जो लोग हमर्दद नजर आते हैं वे वास्तव में अपने नहीं है। देश में आतंकवाद का शिकार बनने वाले लोग अपने होते हैं। ऐसे चंद लोगों के कारण ही पूरा संप्रदाय अविश्वसनीय हो गया है। हांलाकि दिल्ली पुलिस के खुलासे और इंस्पेक्टर की शहादत के बाद अब इन सभी लोगों की जुबान पर ताले लगे हुए हैं। लेकिन इससे क्या। अविश्वास की खाई तो और चौड़ी हो ही चुकी है। मैं तो यह सोच कर सिहर उठता हूं, कि यदि इस आपरेशन बटला हाउस में पुलिस को कोई क्षति नहीं उठानी पड़ती तो तब क्या होता? एक बार फिर वोट बैंक की राजनीति शुरू हो जाती। अभी तक खामोश बने हुए तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोग और राजनेता आतंकी अबू बशर के घर की भांति फिर सैफ के घर पर जुटने शुरू हो जाते। सरकार और प्रशासन को कोसकर आतंकवाद को जड़ों को सींचते। देश में दिनोदिन बढ़ रहे आतंकवाद के खतरे के मद्देनजर अब चेत जाने की जरूरत हैं। यह हम सबका देश है। आतंकी घटना के वक्त घटनास्थल पर नहीं होने से हम भले ही बच जाए, लेकिन इसका असर हम पर जरूर पड़ता है। वह हमला घायल करता है। इसलिए संकीर्ण नजरिया और सिर्फ अपना हित साधने की मानसिकता छोड़नी होगी। आतंकी किसी कौम या मजहब के नहीं हैं, यह छोटी से बात जो अभी तक चंद लोग समझ कर भी नहीं समझ रहे, उन्हें समझनी ही होगी। वरना केवल कुछ साल बाद ही इराक, अफगानिस्तान और पाकिस्तान की कतार में भारत भी होगा। अभी हाल ही में हुए एक सर्वे के अनुसार पिछले कुछ सालों में विश्व में इराक के बाद सबसे ज्यादा धमाके भारत में हुए हैं। यही नहीं इनमें इराक के बाद सबसे ज्यादा मौतें भी भारत में ही हुई हैं। इसलिए नजरिया बदलें और आतंकवादियों को मुंहतोड़ जवाब दें।

                                             एक और वज्रपात, नीरज भैया को  लील गया कोरोना  दिल के अंदर कुछ टूट सा गया है, ऐसा कुछ, जिसका जुड़...